मैंने भी इक सदा
सुनी थी कभी कहीं,
आज तक वो
मेरी तन्हाईयों में
आवाज़ देती है,
और बुलाती है मुझे वहाँ
जहाँ,
सुनी थी कभी कहीं,
आज तक वो
मेरी तन्हाईयों में
आवाज़ देती है,
और बुलाती है मुझे वहाँ
जहाँ,
मेरी उदास शाम
शबनम के मोतियों से ,
सुबह होने तक लिखती है
सिर्फ तुम्हारा ही नाम ।




